जिन्हें मारवाड़ी ब्राह्मण कहा जाता है वह महर्षि पराशर, महर्षि भरद्वाज और ऋषि सारस्वत, ग्वाला, गौतम, श्रृंगी और दाधीच के वंशज है।
उसमें से...
परंपरागत मान्यता और ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार, ब्रह्मा (ब्रह्मदेव) का ब्रह्मर्षिनाम करके एक पुत्र था। उस पुत्र के वंश में पारब्रह्म नामक पुत्र हुआ, उससे कृपाचार्य हुए, कृपाचार्य के दो पुत्र हुए, उनका छोटा पुत्र शक्ति था। शक्ति के पांच पुत्र हुए- सारस्वत, ग्वाला, गौतम, श्रृंगी और दाधीच।
प्रथम पुत्र सारस्वत ऋषि के वंशज सारस्वत कहलाए,
दूसरे पुत्र ग्वाला ऋषि के वंशज गौड़ कहलाए,
तीसरे पुत्र गौतम ऋषि के वंशज गुर्जर गौड़ कहलाए,
चौथे पुत्र श्रृंगी ऋषि के वंशज शिखवाल कहलाए,
पांचवें पुत्र दाधीच ऋषि के वंशज दायमा या दाधीच कहलाए।
संयोगवश इन पांचो ऋषियों (सारस्वत, ग्वाला, गौतम, श्रृंगी, दाधीच) और महर्षि पराशर के पिता का नाम "शक्ति" ही है परन्तु यह एक ही नाम के दो अलग-अलग ऋषि थे। महर्षि पराशर के पिता मुनि शक्ति जो है, ब्रम्हर्षि वशिष्ठ के पुत्र है तो सारस्वत, ग्वाला, गौतम, श्रृंगी और दाधीच इन पांचो ऋषियों के पिता ऋषि शक्ति जो है, वह कृपाचार्य के पुत्र है।
महर्षि पराशर —
महाभारत काल में एक महान ऋषि हुए, जिन्हें महर्षि पराशर के नाम से जाना जाता हैं। महर्षि पराशर जो है, वह मुनि शक्ति के पुत्र तथा वसिष्ठ के पौत्र थे। ये महाभारत ग्रन्थ के रचयिता महर्षि वेदव्यास के पिता थे। महर्षि पराशर की परंपरा में आगे वेदव्यास के शुकदेव, शुकदेव के गौड़पादाचार्य, गौड़पादाचार्य के गोविंदपाद, गोविंदपाद के शंकराचार्य (आदि शंकराचार्य) हुए। सबके सब आदिशक्ति माँ भगवती के उपासक रहे है। महर्षि पराशर प्राचीन भारतीय ऋषि मुनि परंपरा की श्रेणी में एक महान ऋषि हैं। योग सिद्दियों के द्वारा अनेक महान शक्तियों को प्राप्त करने वाले महर्षि पराशर महान तप, साधना और भक्ति द्वारा जीवन के पथ प्रदर्शक के रुप में सामने आते हैं। इनका दिव्य जीवन अत्यंत आलोकिक एवम अद्वितीय हैं।
द्वापर युग के उत्तरार्ध में (जिसे महाभारतकाल कहा जाता है) धर्म की स्थापना के लिए दो महान व्यक्तित्वों ने प्रयास किये उनमें एक है श्रीकृष्ण और दूसरे है महर्षि पराशर। श्रीकृष्ण ने शस्त्र के माध्यम से और महर्षि पराशर ने शास्त्र के माध्यम से धर्म की स्थापना के लिए प्रयास किया। तत्कालीन शास्त्रों में उल्लेख मिलते है की धर्म की स्थापना के लिए महर्षि पराशर ने अथक प्रयास किये, वे कई राजाओं से मिले, उनके इस प्रयास से कुछ लोग नाराज हुए, महर्षि पराशर पर हमले किये गए, उन्हें गम्भीर चोटें पहुंचाई गई। महर्षि पराशर द्वारा रचित "पराशर स्मृति" (धर्म संहिता), उनके धर्म स्थापना के इसी प्रयासों में से किया गया एक प्रमुख कार्य है। स्मृतियों को धर्मशास्त्र भी कहा जाता है। पराशर स्मृति में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि यह स्मृति कृतयुग (कलियुग) के लिए प्रमाण है, गौतम लिखित त्रेता के लिए, शंखलिखित स्मृति द्वापर के लिए और पराशर स्मृति कलि (कलियुग) के लिए। महर्षि पराशर अपने एक सूत्र में कहते है की- ज्योतिष, धर्म और आयुर्वेद एक-दूसरे में पूर्णत: गुंथे हुए हैं (Future, Religion and Health are completely interconnected -Adi Maheshacharya Maharshi Parashar)।
महर्षि पराशर के वंशज पारीक कहलाए,
महर्षि भारद्वाज —
महाभारत के अनुसार अजेय धनुर्धर तथा कौरवों और पाण्डवों के गुरु द्रोणाचार्य इन्हीं ऋषि भरद्वाज के पुत्र थे। महाभारत ग्रन्थ में वर्णन आता है कि ऋषि भरद्वाज धर्मराज युधिष्टिर के राजसूय-यज्ञ में भी आमंत्रित थे। ये आयुर्वेद के ज्ञाता ऋषि थे तथा धन्वंतरि इनके शिष्य थे। वे जहाँ आयुर्वेद के धुरन्धर ज्ञाता थे, वहीं मंत्र, यंत्र और तंत्र तीनों क्षेत्रों में पारंगत थे। एक महान् आयुर्वेदज्ञ के अतिरिक्त भरद्वाज ऋषि एक अद्भुत विलक्षण प्रतिभा-संपन्न विमान-शास्त्री थे। दिव्यास्त्रों से लेकर विभिन्न प्रकार के अस्त्र, शस्त्र, यन्त्र तथा विलक्षण विमानों के निर्माण के क्षेत्र में आज तक उनके स्थान को कोई पा नहीं सका है।
महर्षि भारद्वाज के वंशज खंडेलवाल कहलाएं।
आगे चलकर काल के प्रवाह में इनकी शर्मा, जोशी, व्यास, ओझा, तिवारी आदि नामों से कई उपखापें बनी जो पूरे भारत में और विदेशों में बसी हुई है। लेकिन इन सभी का मूल/जड़ें राजस्थान से है।
जानिए, मारवाड़ी ब्राह्मण, महेश नवमी और माहेश्वरी समाज के बिच में क्या है अटूट आपसी सम्बन्ध —
माहेश्वरी समाज की पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही परंपरागत मान्यता के अनुसार, महाभारत के उत्तरार्ध काल में, अर्थात ईसवी सन पूर्व 3133 में स्वयं भगवान महेश जी (भगवान शिव) और देवी आदिशक्ति पार्वती द्वारा माहेश्वरी समाज की उत्पत्ति हुई थी (इसे माहेश्वरी वंशोत्पत्ति तथा माहेश्वरी समाज की स्थापना होना भी कहा जाता है)। माहेश्वरी समाज उत्पत्ति के इसी घटनाक्रम में भगवान महेशजी ने माहेश्वरीयों/माहेश्वरी समाज को धर्म के मार्ग पर चलने के लिए मार्गदर्शन करनेका दायित्व महर्षि पराशर, ऋषि सारस्वत, ग्वाला, गौतम, श्रृंगी, दाधीच इन छः (6) ऋषियों को सौपा था (माहेश्वरी समाज उत्पत्ति के परंपरागत चित्र/फोटो में जो 6 ऋषि बैठे हुए दिखाई देते है यह वहीं महर्षि पराशर और ऋषि सारस्वत, ग्वाला, गौतम, श्रृंगी और दाधीच है)। आगे माहेश्वरी समाज में इन्हे गुरु महाराज के नाम से जाना जाने लगा। कालांतर में इन गुरुओं ने महर्षि भारद्वाज को भी माहेश्वरी गुरु पद प्रदान किया जिससे माहेश्वरी गुरुओं की संख्या सात हो गई जिन्हे माहेश्वरीयों में सप्तर्षि कहा जाता है। गुरुमहाराज माहेश्वरी समाज का ही (एक) अंग (माहेश्वरी) माने गए।
कालांतर में इन सप्तगुरुओं ने माहेश्वरी समाज के प्रबंधन-मार्गदर्शन का कार्य सुचारू रूप से चले इसलिए एक 'गुरुपीठ' को स्थापन किया जिसे "माहेश्वरी गुरुपीठ" कहा जाता था। इस माहेश्वरी गुरुपीठ के इष्ट देव 'महेश परिवार' (भगवान महेश, पार्वती, गणेश आदि...) है। सप्तगुरुओं ने माहेश्वरी समाज के प्रतिक-चिन्ह 'मोड़' (जिसमें एक त्रिशूल और त्रिशूल के बीच के पाते में एक वृत्त तथा वृत्त के बीच ॐ (प्रणव) होता है) और ध्वज का सृजन किया। ध्वज को "दिव्य ध्वज" कहा गया। दिव्य ध्वज (केसरिया रंग के ध्वजा पर अंकित मोड़ का निशान) माहेश्वरी समाज की ध्वजा बनी। गुरुपीठ के पीठाधिपति “महेशाचार्य” की उपाधि से अलंकृत थे। महेशाचार्य- यह माहेश्वरी समाज का सर्वोच्च गुरु पद है। महर्षि पराशर माहेश्वरी गुरुपीठ के प्रथम पीठाधिपति है और इसीलिए महर्षि पराशर "आदि महेशाचार्य" है। वर्तमान समय में, योगी प्रेमसुखानन्द माहेश्वरी महाराज माहेश्वरी समाज के सर्वोच्च गुरुपीठ "माहेश्वरी अखाडा" के पीठाधिपति एवं महेशाचार्य है।




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