कौन है मारवाड़ी ब्राह्मण | Mahesh Navami और मारवाड़ी ब्राह्मण के बिच में क्या है अटूट सम्बन्ध | Mahesh Navami Date, Time, Tithi, Puja Muhurat and Rituals | Mahesh Navami 2026 | Maheshwari Gurupeeth - Maheshwari Akhada | Mahesh Navami Special


जिन्हें मारवाड़ी ब्राह्मण कहा जाता है वह महर्षि पराशर, महर्षि भरद्वाज और ऋषि सारस्वत, ग्वाला, गौतम, श्रृंगी और दाधीच के वंशज है।
उसमें से...

परंपरागत मान्यता और ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार, ब्रह्मा (ब्रह्मदेव) का ब्रह्मर्षिनाम करके एक पुत्र था। उस पुत्र के वंश में पारब्रह्म नामक पुत्र हुआ, उससे कृपाचार्य हुए, कृपाचार्य के दो पुत्र हुए, उनका छोटा पुत्र शक्ति था। शक्ति के पांच पुत्र हुए- सारस्वत, ग्वाला, गौतम, श्रृंगी और दाधीच।

प्रथम पुत्र सारस्वत ऋषि के वंशज सारस्वत कहलाए,

दूसरे पुत्र ग्वाला ऋषि के वंशज गौड़ कहलाए,

तीसरे पुत्र गौतम ऋषि के वंशज गुर्जर गौड़ कहलाए,

चौथे पुत्र श्रृंगी ऋषि के वंशज शिखवाल कहलाए,

पांचवें पुत्र दाधीच ऋषि के वंशज दायमा या दाधीच कहलाए।

संयोगवश इन पांचो ऋषियों (सारस्वत, ग्वाला, गौतम, श्रृंगी, दाधीच) और महर्षि पराशर के पिता का नाम "शक्ति" ही है परन्तु यह एक ही नाम के दो अलग-अलग ऋषि थे। महर्षि पराशर के पिता मुनि शक्ति जो है, ब्रम्हर्षि वशिष्ठ के पुत्र है तो सारस्वत, ग्वाला, गौतम, श्रृंगी और दाधीच इन पांचो ऋषियों के पिता ऋषि शक्ति जो है, वह कृपाचार्य के पुत्र है।

महर्षि पराशर —
महाभारत काल में एक महान ऋषि हुए, जिन्हें महर्षि पराशर के नाम से जाना जाता हैं। महर्षि पराशर जो है, वह मुनि शक्ति के पुत्र तथा वसिष्ठ के पौत्र थे। ये महाभारत ग्रन्थ के रचयिता महर्षि वेदव्यास के पिता थे। महर्षि पराशर की परंपरा में आगे वेदव्यास के शुकदेव, शुकदेव के गौड़पादाचार्य, गौड़पादाचार्य के गोविंदपाद, गोविंदपाद के शंकराचार्य (आदि शंकराचार्य) हुए। सबके सब आदिशक्ति माँ भगवती के उपासक रहे है। महर्षि पराशर प्राचीन भारतीय ऋषि मुनि परंपरा की श्रेणी में एक महान ऋषि हैं। योग सिद्दियों के द्वारा अनेक महान शक्तियों को प्राप्त करने वाले महर्षि पराशर महान तप, साधना और भक्ति द्वारा जीवन के पथ प्रदर्शक के रुप में सामने आते हैं। इनका दिव्य जीवन अत्यंत आलोकिक एवम अद्वितीय हैं।

द्वापर युग के उत्तरार्ध में (जिसे महाभारतकाल कहा जाता है) धर्म की स्थापना के लिए दो महान व्यक्तित्वों ने प्रयास किये उनमें एक है श्रीकृष्ण और दूसरे है महर्षि पराशर। श्रीकृष्ण ने शस्त्र के माध्यम से और महर्षि पराशर ने शास्त्र के माध्यम से धर्म की स्थापना के लिए प्रयास किया। तत्कालीन शास्त्रों में उल्लेख मिलते है की धर्म की स्थापना के लिए महर्षि पराशर ने अथक प्रयास किये, वे कई राजाओं से मिले, उनके इस प्रयास से कुछ लोग नाराज हुए, महर्षि पराशर पर हमले किये गए, उन्हें गम्भीर चोटें पहुंचाई गई। महर्षि पराशर द्वारा रचित "पराशर स्मृति" (धर्म संहिता), उनके धर्म स्थापना के इसी प्रयासों में से किया गया एक प्रमुख कार्य है। स्मृतियों को धर्मशास्त्र भी कहा जाता है। पराशर स्मृति में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि यह स्मृति कृतयुग (कलियुग) के लिए प्रमाण है, गौतम लिखित त्रेता के लिए, शंखलिखित स्मृति द्वापर के लिए और पराशर स्मृति कलि (कलियुग) के लिए। महर्षि पराशर अपने एक सूत्र में कहते है की- ज्योतिष, धर्म और आयुर्वेद एक-दूसरे में पूर्णत: गुंथे हुए हैं (Future, Religion and Health are completely interconnected -Adi Maheshacharya Maharshi Parashar)।

महर्षि पराशर के वंशज पारीक कहलाए,

महर्षि भारद्वाज
महाभारत के अनुसार अजेय धनुर्धर तथा कौरवों और पाण्डवों के गुरु द्रोणाचार्य इन्हीं ऋषि भरद्वाज के पुत्र थे। महाभारत ग्रन्थ में वर्णन आता है कि ऋषि भरद्वाज धर्मराज युधिष्टिर के राजसूय-यज्ञ में भी आमंत्रित थे। ये आयुर्वेद के ज्ञाता ऋषि थे तथा धन्वंतरि इनके शिष्य थे। वे जहाँ आयुर्वेद के धुरन्धर ज्ञाता थे, वहीं मंत्र, यंत्र और तंत्र तीनों क्षेत्रों में पारंगत थे। एक महान् आयुर्वेदज्ञ के अतिरिक्त भरद्वाज ऋषि एक अद्भुत विलक्षण प्रतिभा-संपन्न विमान-शास्त्री थे। दिव्यास्त्रों से लेकर विभिन्न प्रकार के अस्त्र, शस्त्र, यन्त्र तथा विलक्षण विमानों के निर्माण के क्षेत्र में आज तक उनके स्थान को कोई पा नहीं सका है।

महर्षि भारद्वाज के वंशज खंडेलवाल कहलाएं।

आगे चलकर काल के प्रवाह में इनकी शर्मा, जोशी, व्यास, ओझा, तिवारी आदि नामों से कई उपखापें बनी जो पूरे भारत में और विदेशों में बसी हुई है। लेकिन इन सभी का मूल/जड़ें राजस्थान से है।

जानिए, मारवाड़ी ब्राह्मण, महेश नवमी और माहेश्वरी समाज के बिच में क्या है अटूट आपसी सम्बन्ध

माहेश्वरी समाज की पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही परंपरागत मान्यता के अनुसार, महाभारत के उत्तरार्ध काल में, अर्थात ईसवी सन पूर्व 3133 में स्वयं भगवान महेश जी (भगवान शिव) और देवी आदिशक्ति पार्वती द्वारा माहेश्वरी समाज की उत्पत्ति हुई थी (इसे माहेश्वरी वंशोत्पत्ति तथा माहेश्वरी समाज की स्थापना होना भी कहा जाता है)। माहेश्वरी समाज उत्पत्ति के इसी घटनाक्रम में भगवान महेशजी ने माहेश्वरीयों/माहेश्वरी समाज को धर्म के मार्ग पर चलने के लिए मार्गदर्शन करनेका दायित्व महर्षि पराशर, ऋषि सारस्वत, ग्वाला, गौतम, श्रृंगी, दाधीच इन छः (6) ऋषियों को सौपा था (माहेश्वरी समाज उत्पत्ति के परंपरागत चित्र/फोटो में जो 6 ऋषि बैठे हुए दिखाई देते है यह वहीं महर्षि पराशर और ऋषि सारस्वत, ग्वाला, गौतम, श्रृंगी और दाधीच है)आगे माहेश्वरी समाज में इन्हे गुरु महाराज के नाम से जाना जाने लगा। कालांतर में इन गुरुओं ने महर्षि भारद्वाज को भी माहेश्वरी गुरु पद प्रदान किया जिससे माहेश्वरी गुरुओं की संख्या सात हो गई जिन्हे माहेश्वरीयों में सप्तर्षि कहा जाता है। गुरुमहाराज माहेश्वरी समाज का ही (एक) अंग (माहेश्वरी) माने गए।

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कालांतर में इन सप्तगुरुओं ने माहेश्वरी समाज के प्रबंधन-मार्गदर्शन का कार्य सुचारू रूप से चले इसलिए एक 'गुरुपीठ' को स्थापन किया जिसे "माहेश्वरी गुरुपीठ" कहा जाता था। इस माहेश्वरी गुरुपीठ के इष्ट देव 'महेश परिवार' (भगवान महेश, पार्वती, गणेश आदि...) है। सप्तगुरुओं ने माहेश्वरी समाज के प्रतिक-चिन्ह 'मोड़' (जिसमें एक त्रिशूल और त्रिशूल के बीच के पाते में एक वृत्त तथा वृत्त के बीच ॐ (प्रणव) होता है) और ध्वज का सृजन किया। ध्वज को "दिव्य ध्वज" कहा गया। दिव्य ध्वज (केसरिया रंग के ध्वजा पर अंकित मोड़ का निशान) माहेश्वरी समाज की ध्वजा बनी। गुरुपीठ के पीठाधिपति “महेशाचार्य” की उपाधि से अलंकृत थे। महेशाचार्य- यह माहेश्वरी समाज का सर्वोच्च गुरु पद है। महर्षि पराशर माहेश्वरी गुरुपीठ के प्रथम पीठाधिपति है और इसीलिए महर्षि पराशर "आदि महेशाचार्य" है। वर्तमान समय में, योगी प्रेमसुखानन्द माहेश्वरी महाराज माहेश्वरी समाज के सर्वोच्च गुरुपीठ "माहेश्वरी अखाडा" के पीठाधिपति एवं महेशाचार्य है

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हरएक माहेश्वरी को यह पूरी पोस्ट जरूर पढ़नी चाहिए... | Very IMP | जानिए, माहेश्वरीयों के कुलदेवता और वंशदेवता के बारे में | Mahesh Navami | Maheshwari Samaj | Maheshacharya Premsukhanand Maheshwari

Every Maheshwari must read this entire post, Know about the family deities and lineage deitie of Maheshwaris...


Maheshacharya Yogi Premsukhanand Maheshwari : Mahesh Navami is the day to celebrate the origin of a new dynasty named Maheshwari, created by the blessing of Bhagwan Maheshji (Lord Mahesha / Lord Shiva). Maheshwari community and Maheshwari people celebrate this holy day as Maheshwari Vanshotpatti Diwas and in the name of Mahesh Navami with great devotion and pomp. Mahesh Navami is considered to be the biggest festival of Maheshwari community. The festival of Mahesh Navami expresses the full reverence and devotion of the Maheshwaris towards the lineage deity of Maheshwaris, Bhagwan Maheshji and Adishakti Goddess Parvati.


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भगवान महेशजी के वरदान से निर्मित हुए माहेश्वरी नाम के एक नए वंश की उत्पत्ति का उत्सव मनाने का दिन है महेश नवमी। इसी पावन दिन को माहेश्वरी समाज और माहेश्वरी लोग माहेश्वरी वंशोत्पत्ति दिवस के रूप में तथा महेश नवमी के नाम से श्रद्धाभाव के साथ और बड़े ही धूमधाम से मनाते है। महेश नवमी यह माहेश्वरी समाज का सबसे बड़ा त्योंहार, सबसे बड़ा पर्व माना जाता है। महेश नवमी का पर्व माहेश्वरीयों की, माहेश्वरीयों के वंशदेवता भगवान महेशजी और आदिशक्ति देवी पार्वती के प्रति पूर्ण श्रद्धा और भक्तिभाव को प्रकट करता है।


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जानिए, माहेश्वरीयों के कुलदेवता और वंशदेवता के बारे में

वंश माने जैसे राजपूत वंश, अग्रवाल वंश, माहेश्वरी वंश, आदि। वंशदेवता एक तरह से प्रधानमंत्री की तरह होते है। वे जिस वंश के वंशदेवता होते हैं वह पूरा वंश उनके अधिकार क्षेत्र में आता है, वे उस समग्र वंश के संरक्षण और भलाई के लिए जिम्मेवार होते है।

कुल माने जैसे जाजू कुल, बाहेती कुल, लड्डा कुल, आदि। हरएक कुल की अपनी अपनी एक कुलदेवी होती है। कुलदेवी/कुलदेवता एक तरह से मुख्यमंत्री की तरह होती हैं। वे जिस कुल की कुलदेवी/कुलदेवता होती है वह पूरा कुल उनके अधिकार क्षेत्र के अंतर्गत आता है, वे उस कुल के संरक्षण और भलाई के लिए जिम्मेवार होती हैं।

माहेश्वरी समाज के संबंध में कहे तो हरएक कुल की कुलदेवी आदिशक्ति देवी पार्वती की अंश स्वरूप है। देवी पार्वती का ही एक रूप है।

हर एक ग्राम (गांव) या नगर (शहर) की भी अपनी अपनी एक देवता होती है उन्हें ग्रामदेवी कहा जाता है। ग्रामदेवी एक तरह से गांव/शहर के मुखिया की तरह होती है। वे जिस ग्राम की ग्रामदेवी होती है उस ग्राम में निवास करनेवाले समस्त जीव/लोग ग्रामदेवी के अधिकार क्षेत्र के अंतर्गत आते हैं। वह उस ग्राम/शहर में निवास करनेवाले लोगों के संरक्षण और भलाई की जिम्मेवार होती है।

माहेश्वरीयों के लिए भी और सभी के लिए भी जितना अपनी कुलदेवी/कुलदेवता की भक्ति और आराधना करना जरूरी है, उतना ही जरूरी है अपने वंश के वंशदेवता की भक्ति और आराधना करना। इसी के साथ, वर्तमान समय में वो जिस गांव या शहर में निवास और कारोबार कर रहे हैं उस गांव/शहर की ग्रामदेवी की भी भक्ति और आराधना करना।
समझने की दृष्टि से कहे तो जैसे भौतिक सरकारें होती है, जैसे की, केंद्र सरकार (मुखिया: प्रधानमंत्री), राज्य सरकार (मुखिया: मुख्यमंत्री) और गावं/शहर का मुखिया वैसे ही वंशदेवता, कुलदेवता और ग्रामदेवता ये दैविक सरकार होती है, जो अपने-अपने अधिकारक्षेत्र के अंतर्गत अपने-अपने कर्तव्य और अधिकार निभाती है।

वंशदेवता, कुलदेवी और ग्रामदेवी इन तीनों की भक्ति और आराधना की जाए तो जीवन को संपन्न- सुखी बनाने में आनेवाली अधिदैविक/आधिभौतिक बाधाएं दूर होकर सफलता का मार्ग प्रशस्त होता है।

सनातन धर्म की परंपरा में इन्हीं वंशों को वैष्णव, शैव, शाक्त और गानपत्य के रूप में बताया गया है। प्राधान्य क्रमानुसार वंशदेवता, कुलदेवता और ग्रामदेवता इन तीनों के बाद आप अपने श्रद्धाभाव के अनुसार किसी अन्य देवी-देवता की भी भक्ति और आराधना कर सकते हैं लेकिन वह स्वैच्छिक होता है, उसमें किसी का किसी पर कोई अधिकार या कर्तव्य का भाग या भाव नहीं होता है।

धार्मिक मान्यताओं और शास्त्रों के अनुसार आपके जो वंशदेवता, कुलदेवी/कुलदेवता और ग्रामदेवी होते है उनकी मर्जी तथा अनुमति के बगैर कोई अन्य देवी-देवता चाहकर भी आपकी सहायता नहीं कर सकते। इसीलिए वंशदेवता, कुलदेवी/कुलदेवता और ग्रामदेवी इन तीनों की आराधना और भक्ति को प्राधान्यक्रम में सर्वप्रथम रखा जाता है। इन्हे प्रसन्न रखने के लिए आपको बहुत ज्यादा प्रयास भी नहीं करने पड़ते है, ये तो श्रद्धाभाव से किये गए आपके बस थोड़ी सी आराधना और भक्ति से ही प्रसन्न हो जाते है, आप पर अपनी कृपा और आशीर्वाद बरसाने लगते है।