Mahesh Navami - 2026 Date, Time, Tithi, Samvat, Story & Rituals | Mahesh Navami Puja Vidhi and Shubh Muhurat | Significance of Maheshwari Religious Symbol and Flag on Mahesh Navami

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Know, Why is Mahesh Navami celebrated and what is its significance for the Maheshwari community? What is Mahesh Navami? Why Mahesh Navami called Maheshwari Utpatti or Vanshotpatti Diwas. Why is Yudhishthira Samvat used in Maheshwari community?

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महेश नवमी का पर्व ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को मनाया जाता है. ऐसा माना जाता है कि इस दिन भगवान महेश (भगवान शिव) के वरदान और देवी महेश्वरी (पार्वती) के आशीर्वाद से माहेश्वरी समाज की उत्पत्ति हुई, जिसे माहेश्वरी समाज माहेश्वरी वंशोत्पत्ति कहता है. माहेश्वरी मान्यता के अनुसार 3133 ईसा पूर्व में इसी दिन एक नए वंश की, माहेश्वरी वंश की शुरुवात हुई (इस दिन को माहेश्वरी समाज का स्थापना दिवस भी कहा जा सकता है), तभी से माहेश्वरी समाज माहेश्वरी वंशोत्पत्ति दिवस को महेश नवमी के नाम से मनाता आया है, मना रहा है. इसलिए माहेश्वरीयों के हर एक घर-परिवार में इस दिन भगवान महेश जी की पूजा का विधान है. इतना ही नहीं, समाज के विभिन्न संगठनों की ओरसे इस दिन "महेश नवमी" को सार्वजनिक रूप से भी मनाया जाता है, शोभायात्रा निकाली जाती है, भगवान महेश जी की महा आरती की जाती है, तथा इस अवसर पर समाजहित, जनहित एवं देशहित के अनेको कार्यक्रमों को आयोजित किया जाता है. महेश नवमी का यह त्योंहार माहेश्वरीयों और माहेश्वरी समाज के अस्तित्व और पहचान से जुड़ा हुवा त्योंहार है इसलिए महेश नवमी माहेश्वरीयों का सबसे बड़ा त्योंहार है, सबसे बड़ा पर्व है. परंपरागत मान्यता के अनुसार महेश नवमी के दिन भगवान महेश जी की विधि विधान से पूजा करने से सुख, समृद्धि, धन, वैभव तथा यश और कीर्ति की प्राप्ति होती है.


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महेश नवमी ज्येष्ठ शुक्ल नवमी तिथि को मनाई जाती है, ईसवी सन पूर्व 3133 में इसी तिथि को स्वयं भगवान महेशजी और देवी पार्वती ने माहेश्वरी समाज की उत्पत्ति/स्थापना की थी और माहेश्वरी समाज अस्तित्व में आया था. माहेश्वरी समाज के अस्तित्व में आने के साथ ही माहेश्वरी संस्कृति भी अस्तित्व में आयी जिसे माहेश्वरीत्व (English: Maheshwarism) कहा जाता है. माहेश्वरी समाज के उदय के साथ ही माहेश्वरीत्व (Maheshwarism) का उदय हुवा. इसलिए महेश नवमी माहेश्वरीत्व और माहेश्वरी समाज के अस्तित्व से जुड़ा हुवा त्योंहार है, माहेश्वरी समाज की "माहेश्वरी" इस विशिष्ठ पहचान से जुड़ा हुवा त्योंहार है. महेश नवमी का त्योंहार मनाना अर्थात अपने माहेश्वरी समाज के अस्तित्व को कायम रखना है, अपनी विशिष्ठ पहचान को कायम रखना है, अपनी गौरवपूर्ण संस्कृति और विरासत का संरक्षण और संवर्धन करना है.


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महेश नवमी के कार्यक्रमों के आयोजन में माहेश्वरी संगठनों के पदाधिकारियों को, समाज के बुद्धिजीवियों को; माहेश्वरी समाज की उत्पत्ति कैसे हुई थी? क्यों हुई थी? माहेश्वरी समाज की उत्पत्ति होने की इस गौरवपूर्ण घटना के समय और क्या क्या चीजें हुई थी, क्या क्या बातें हुई थी? उनका मतलब क्या था? इससे माहेश्वरी संस्कृति कैसे विकसित हुई? ईसवी सन पूर्व 3133 में घटित हुई माहेश्वरी समाज की उत्पत्ति के घटना से जुडी वह कौन कौनसी परम्पराएं है, जिसे माहेश्वरी समाज और माहेश्वरी समाज के लोग आज भी निभाते है... इसी जानकारी में माहेश्वरी समाज के प्रगति का, समृद्धि का, बरकत का, समाज और समाज के लोगों को दुनिया में मिलनेवाले आदर और मान-सम्मान का, माहेश्वरी समाज के लोगों की जीवनशैली (Lifestyle) का फार्मूला/राज़ (Secret) छुपा हुवा है. इन सभी बातों की एक एक डिटेल्स से समाज के लोगों को और खास कर के नई पीढ़ी को बताने की जरुरत है. माहेश्वरी समाज के लिए निकलनेवाली न्यूज़ पत्रिकायें भी इसमें कारगर भूमिका निभा सकती है. तभी महेश नवमी का त्योंहार मनाने की सार्थकता है. वर्ना तो ऐसे होगा की विवाह के कार्यक्रम में मंडप, स्टेज, बैंडबाजा, भोजन-व्यवस्था, पंडितजी और लोगबाग सब है लेकिन ना विवाह किसका है ये पता है और ना दूल्हा-दुल्हन है तो विवाह का या विवाह में शामिल होने का क्या मतलब है. कहने का तात्पर्य यह है की महेश नवमी के कार्यक्रमों में विशेष रूप से, ध्यान देकर माहेश्वरी समाज की उत्पत्ति की घटना और उत्पत्ति के बाद से अबतक के संक्षिप्त इतिहास के बारे में परिपूर्ण जानकारी समाजजनों को देने का कार्य किया जाना चाहिए.

माहेश्वरी समाज की उत्पत्ति कैसे हुई? क्यों हुई? उस समय क्या क्या हुवा? माहेश्वरीत्व अर्थात माहेश्वरी संस्कृति आगे कैसे विकसित हुई? माहेश्वरी समाज की उत्पत्ति से जुडी ऐसी कौन कौनसी परम्पराएं है जिन्हे माहेश्वरी लोग आज भी निभाते है, इसे जानने के लिए इस Link पर Click/Touch कीजिये > The Book, Maheshwari Origin And Brief History Part-1, Author- Maheshacharya Premsukhanand Maheshwari. माहेश्वरी उत्पत्ति और संक्षिप्त इतिहास, योगी प्रेमसुखानन्द माहेश्वरी द्वारा लिखित पुस्तक पार्ट-1

माहेश्वरी समाज की उत्पत्ति के बाद से अबतक के संक्षिप्त इतिहास के बारे में जानने के लिए इस Link पर Click/Touch कीजिये > Brief History of Maheshwari Community Since Its Origin Till Now, माहेश्वरी उत्पत्ति और संक्षिप्त इतिहास, योगी प्रेमसुखानन्द माहेश्वरी द्वारा लिखित पुस्तक, पार्ट-2

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कौन है मारवाड़ी ब्राह्मण | Mahesh Navami और मारवाड़ी ब्राह्मण के बिच में क्या है अटूट सम्बन्ध | Mahesh Navami Date, Time, Tithi, Puja Muhurat and Rituals | Mahesh Navami 2026 | Maheshwari Gurupeeth - Maheshwari Akhada | Mahesh Navami Special

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जिन्हें मारवाड़ी ब्राह्मण कहा जाता है वह महर्षि पराशर, महर्षि भरद्वाज और ऋषि सारस्वत, ग्वाला, गौतम, श्रृंगी और दाधीच के वंशज है।
उसमें से...

परंपरागत मान्यता और ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार, ब्रह्मा (ब्रह्मदेव) का ब्रह्मर्षिनाम करके एक पुत्र था। उस पुत्र के वंश में पारब्रह्म नामक पुत्र हुआ, उससे कृपाचार्य हुए, कृपाचार्य के दो पुत्र हुए, उनका छोटा पुत्र शक्ति था। शक्ति के पांच पुत्र हुए- सारस्वत, ग्वाला, गौतम, श्रृंगी और दाधीच।

प्रथम पुत्र सारस्वत ऋषि के वंशज सारस्वत कहलाए,

दूसरे पुत्र ग्वाला ऋषि के वंशज गौड़ कहलाए,

तीसरे पुत्र गौतम ऋषि के वंशज गुर्जर गौड़ कहलाए,

चौथे पुत्र श्रृंगी ऋषि के वंशज शिखवाल कहलाए,

पांचवें पुत्र दाधीच ऋषि के वंशज दायमा या दाधीच कहलाए।

संयोगवश इन पांचो ऋषियों (सारस्वत, ग्वाला, गौतम, श्रृंगी, दाधीच) और महर्षि पराशर के पिता का नाम "शक्ति" ही है परन्तु यह एक ही नाम के दो अलग-अलग ऋषि थे। महर्षि पराशर के पिता मुनि शक्ति जो है, ब्रम्हर्षि वशिष्ठ के पुत्र है तो सारस्वत, ग्वाला, गौतम, श्रृंगी और दाधीच इन पांचो ऋषियों के पिता ऋषि शक्ति जो है, वह कृपाचार्य के पुत्र है।

महर्षि पराशर 
महाभारत काल में एक महान ऋषि हुए, जिन्हें महर्षि पराशर के नाम से जाना जाता हैं। महर्षि पराशर जो है, वह मुनि शक्ति के पुत्र तथा वसिष्ठ के पौत्र थे। ये महाभारत ग्रन्थ के रचयिता महर्षि वेदव्यास के पिता थे। महर्षि पराशर की परंपरा में आगे वेदव्यास के शुकदेव, शुकदेव के गौड़पादाचार्य, गौड़पादाचार्य के गोविंदपाद, गोविंदपाद के शंकराचार्य (आदि शंकराचार्य) हुए। सबके सब आदिशक्ति माँ भगवती के उपासक रहे है। महर्षि पराशर प्राचीन भारतीय ऋषि मुनि परंपरा की श्रेणी में एक महान ऋषि हैं। योग सिद्दियों के द्वारा अनेक महान शक्तियों को प्राप्त करने वाले महर्षि पराशर महान तप, साधना और भक्ति द्वारा जीवन के पथ प्रदर्शक के रुप में सामने आते हैं। इनका दिव्य जीवन अत्यंत आलोकिक एवम अद्वितीय हैं।

द्वापर युग के उत्तरार्ध में (जिसे महाभारतकाल कहा जाता है) धर्म की स्थापना के लिए दो महान व्यक्तित्वों ने प्रयास किये उनमें एक है श्रीकृष्ण और दूसरे है महर्षि पराशर। श्रीकृष्ण ने शस्त्र के माध्यम से और महर्षि पराशर ने शास्त्र के माध्यम से धर्म की स्थापना के लिए प्रयास किया। तत्कालीन शास्त्रों में उल्लेख मिलते है की धर्म की स्थापना के लिए महर्षि पराशर ने अथक प्रयास किये, वे कई राजाओं से मिले, उनके इस प्रयास से कुछ लोग नाराज हुए, महर्षि पराशर पर हमले किये गए, उन्हें गम्भीर चोटें पहुंचाई गई। महर्षि पराशर द्वारा रचित "पराशर स्मृति" (धर्म संहिता), उनके धर्म स्थापना के इसी प्रयासों में से किया गया एक प्रमुख कार्य है। स्मृतियों को धर्मशास्त्र भी कहा जाता है। पराशर स्मृति में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि यह स्मृति कृतयुग (कलियुग) के लिए प्रमाण है, गौतम लिखित त्रेता के लिए, शंखलिखित स्मृति द्वापर के लिए और पराशर स्मृति कलि (कलियुग) के लिए। महर्षि पराशर अपने एक सूत्र में कहते है की- ज्योतिष, धर्म और आयुर्वेद एक-दूसरे में पूर्णत: गुंथे हुए हैं (Future, Religion and Health are completely interconnected -Adi Maheshacharya Maharshi Parashar)।

महर्षि पराशर के वंशज पारीक कहलाए,

महर्षि भरद्वाज
महाभारत के अनुसार अजेय धनुर्धर तथा कौरवों और पाण्डवों के गुरु द्रोणाचार्य इन्हीं ऋषि भरद्वाज के पुत्र थे। महाभारत ग्रन्थ में वर्णन आता है कि ऋषि भरद्वाज धर्मराज युधिष्टिर के राजसूय-यज्ञ में भी आमंत्रित थे। ये आयुर्वेद के ज्ञाता ऋषि थे तथा धन्वंतरि इनके शिष्य थे। वे जहाँ आयुर्वेद के धुरन्धर ज्ञाता थे, वहीं मंत्र, यंत्र और तंत्र तीनों क्षेत्रों में पारंगत थे। एक महान् आयुर्वेदज्ञ के अतिरिक्त भरद्वाज ऋषि एक अद्भुत विलक्षण प्रतिभा-संपन्न विमान-शास्त्री थे। दिव्यास्त्रों से लेकर विभिन्न प्रकार के अस्त्र, शस्त्र, यन्त्र तथा विलक्षण विमानों के निर्माण के क्षेत्र में आज तक उनके स्थान को कोई पा नहीं सका है।

महर्षि भारद्वाज के वंशज खंडेलवाल कहलाएं।

आगे चलकर काल के प्रवाह में इनकी शर्मा, जोशी, व्यास, ओझा, तिवारी आदि नामों से कई उपखापें बनी जो पूरे भारत में और विदेशों में बसी हुई है। लेकिन इन सभी का मूल/जड़ें राजस्थान से है।

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जानिए, मारवाड़ी ब्राह्मण, महेश नवमी और माहेश्वरी समाज के बिच में क्या है अटूट आपसी सम्बन्ध

माहेश्वरी समाज की पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही परंपरागत मान्यता के अनुसार, महाभारत के उत्तरार्ध काल में, अर्थात ईसवी सन पूर्व 3133 में स्वयं भगवान महेश जी (भगवान शिव) और देवी आदिशक्ति पार्वती द्वारा माहेश्वरी समाज की उत्पत्ति हुई थी (इसे माहेश्वरी वंशोत्पत्ति तथा माहेश्वरी समाज की स्थापना होना भी कहा जाता है)। माहेश्वरी समाज उत्पत्ति के इसी घटनाक्रम में भगवान महेशजी ने माहेश्वरीयों/माहेश्वरी समाज को धर्म के मार्ग पर चलने के लिए मार्गदर्शन करनेका दायित्व महर्षि पराशर, ऋषि सारस्वत, ग्वाला, गौतम, श्रृंगी, दाधीच इन छः (6) ऋषियों को सौपा था (माहेश्वरी समाज उत्पत्ति के परंपरागत चित्र/फोटो में जो 6 ऋषि बैठे हुए दिखाई देते है यह वहीं महर्षि पराशर और ऋषि सारस्वत, ग्वाला, गौतम, श्रृंगी और दाधीच है)आगे माहेश्वरी समाज में इन्हे गुरु महाराज के नाम से जाना जाने लगा। कालांतर में इन गुरुओं ने महर्षि भारद्वाज को भी माहेश्वरी गुरु पद प्रदान किया जिससे माहेश्वरी गुरुओं की संख्या सात हो गई जिन्हे माहेश्वरीयों में सप्तर्षि कहा जाता है। गुरुमहाराज माहेश्वरी समाज का ही (एक) अंग (माहेश्वरी) माने गए।


कालांतर में इन सप्तगुरुओं ने माहेश्वरी समाज के प्रबंधन-मार्गदर्शन का कार्य सुचारू रूप से चले इसलिए एक 'गुरुपीठ' को स्थापन किया जिसे "माहेश्वरी गुरुपीठ" कहा जाता था। इस माहेश्वरी गुरुपीठ के इष्ट देव 'महेश परिवार' (भगवान महेश, पार्वती, गणेश आदि...) है। सप्तगुरुओं ने माहेश्वरी समाज के प्रतिक-चिन्ह 'मोड़' (जिसमें एक त्रिशूल और त्रिशूल के बीच के पाते में एक वृत्त तथा वृत्त के बीच ॐ (प्रणव) होता है) और ध्वज का सृजन किया। ध्वज को "दिव्य ध्वज" कहा गया। दिव्य ध्वज (केसरिया रंग के ध्वजा पर अंकित मोड़ का निशान) माहेश्वरी समाज की ध्वजा बनी। गुरुपीठ के पीठाधिपति “महेशाचार्य” की उपाधि से अलंकृत थे। महेशाचार्य- यह माहेश्वरी समाज का सर्वोच्च गुरु पद है। महर्षि पराशर माहेश्वरी गुरुपीठ के प्रथम पीठाधिपति है और इसीलिए महर्षि पराशर "आदि महेशाचार्य" है। वर्तमान समय में, योगी प्रेमसुखानन्द माहेश्वरी महाराज माहेश्वरी समाज के सर्वोच्च गुरुपीठ "माहेश्वरी अखाडा" के पीठाधिपति एवं महेशाचार्य है

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मारवाड़ी ब्राह्मण समाज का इतिहास और वंशावली, माहेश्वरी समाज उत्पत्ति की घटना और माहेश्वरी समाज के इतिहास के सभी तत्थ्यों का, बातों का आकलन करे तो एक सवाल जरूर खड़ा होता है की मारवाड़ी ब्राम्हण समाज ने अपनेआप को महेश नवमी जैसे गौरवमय त्योंहार से क्यों दूर रखा हुवा है? ज्यादातर जगहों पर देखने में आता है की मारवाड़ी ब्राह्मण समाज महेश नवमी के त्योंहार में सक्रीय भागीदारी से, सहभागिता से दूर रहता है, वहीँ यह भी देखने में आता है की माहेश्वरी समाज भी महेश नवमी के कार्यक्रमों के आयोजन में मारवाड़ी ब्राम्हण समाज को सक्रीय सहभागिता से दूर रखता है; उन्हें सहभागी भी बनाते है तो ऐसे की जैसे वो बस मेहमान है। उन्हें गैर माहेश्वरी की तरह देखा जाता है। जानेअनजाने में दोनों ही तरफ से हुई इस चूक को क्या सुधारा नहीं जा सकता है? दोनों ही पक्षों से, समाज के जिम्मेदार लोग और बुद्धिजीवी जन इसपर जरूर विचार करें।

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